मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

थ्री डी के युग में लोकरंजन



थ्री डी मनोरंजन की ओर ले जा रही है, वहां पाली, प्राकृत या संस्कृत के संवाद कौन समझेगा? रंगमंच तो दूर, अब तो लोग सिनेमा हॉल से भी कटने लगे हैं। आप गौर कीजिए कि टीवी पर दिखाए जाए रहे किस तरह के कार्यक्रम दर्शकों को लुभा रहे हैं। इनमें कहीं भी संस्कृत के कार्यक्रम शामिल नहीं हैं।

 आधुनिक दिल्ली के सौ साल पूरे होने पर जो सांस्कृतिक कार्यक्रम किए जा रहे हैं, उनमें संस्कृत के भी दो नाटक हैं। इनमें से एक नाटक अभिज्ञान शाकुंतलम का मंचन पिछले दिनों हो चुका। सेंट स्टीफेंस कॉलेज ने प्रस्तुत किया है।  दूसरा नाटक मृच्छकटिकमू है, जिसका मंचन अभी होना है। इसे संस्कृत विद्यापीठ प्रस्तुत करने जा रहा है। इन दोनों का आयोजन दिल्ली की संस्कृत अकादमी और कला, संस्कृति एवं भाषा विभाग द्वारा कराया जा रहा है।
संस्कृत भाषा के प्रति अपनी तमाम श्रद्धा के बावजूद यह समझना अब सरल हो गया है लेकिन इससे लोगों का मनोरंजन कैसे होगा? आज लोग हिंदी की सामान्य कविताएं भी नहीं समझ पाते और न ही साहित्य पढऩे में ही कोई विशेष रुचि रखते हैं, तो वे संस्कृत नाटक देखने क्यों जाएंगे। संस्कृति का एक हिस्सा पठन-पाठन के लिए होता है और दूसरा लोक रंजन के लिए। ये प्राचीन संस्कृत नाटक अध्ययन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ये उच्चकोटि की साहित्यिक कृतियां हैं।

यह धारणा गलत है :-

यह धारणा गलत है कि आज के दर्शकों की दिलचस्पी संस्कृत के नाटकों में नहीं होगी। जिस दिन अभिज्ञान शाकुंतलम का मंचन किया गया, उस दिन भीड़ संभालने के लिए सभागार के दरवाजों पर गार्ड लगाने पड़े थे। हमें विश्वास है कि मृच्छकटिकमू के साथ भी यही होगा। मानव जीवन के कुछ भाव और प्रसंग कालजयी होते हैं। वे भाषा और देशकाल की सीमाओं को भी लांघ जाते हैं। जैसे आप शेक्सपियर के नाटक देखते हैं, चार्ली चैप्लिन की फिल्में देखते हैं। अभिज्ञान शाकुंतलम और मृच्छकटिकमू ऐसी ही कृतियां हैं। जहां तक भाषा की बात है, तो संस्कृत एक अतिरिक्त आकर्षण है। इसकी वजह से दर्शकों का कौतूहल और बढ़ जाता है। दर्शक तो देखना चाहते हैं, उन्हें दिखाया ही नहीं जाता तो वे क्या करें। सिनेमा, टीवी, धारावाहिकों के प्रचलन ने नाटकों की परंपरा को कुछ समय के लिए धूमिल किया था, पर इधर नाटकों के प्रति उनका आकर्षण फिर से बढ़ा है। मगर मंच पर पात्रों को बिल्कुल सामने देखने-सुनने का अपना अलग ही आनंद होता है। वैसे संवाद की सुविधा के लिए इन नाटकों में हिंदी-अंग्रेजी में सब टाइटल की व्यवस्था की गई है। भारतीय रंगमंच में यह भी एक नई शुरुआत है। 
 - श्रीकृष्ण सेमवाल (उपाध्यक्ष, दिल्ली संस्कृत अकादमी)

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