मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

हिन्दू सभी एक है


भूले सब भाषा प्रांत भेद जात्याभिमान का भ्रम भूले।
पर भूले मजहब हिन्दू है, पर भूले मजहब हिन्दू है॥

हिन्दू नाम, जो हमारे सर्वव्यापक धर्म को बोध कराता था, आज अप्रतिष्ठा को प्राप्त हुआ है। लोग अपने को  हिन्दू कहने में लज्जा का अनुभव करने लगे हैं। इस प्रकार वह स्वर्णिम सूत्र, जिसमें ये सभी विविध आभायुक्त आध्यात्मिक मोची पिरोए हुए थे, छिन्न हो गया है तथा विविध पंथ एवं मत केवल अपने ही नाम पर गर्व करने लगे हैं और अपने को हिन्दू कहलाने से इनकार करने लगे हैं

कुछ सिख, जैन, लिंगायत तथा आर्यसमाजी अपने को हिन्दुओं से पृथक घोषित करते हैं। कुछ प्रमुख सिख नेता भाषायी प्रांत (पंजाबी सूबे) के बहाने सिखों के एक अलग सांप्रदायिक राज्य की मांग के लिए आंदोलन कर रहे हैं। अपनी माँग को पुष्ट करने के लिए उनमें से कुछ तो इतने निम्न स्तर पर आ गए हैं कि अलग मुस्लिम राज्य अर्थात् पाकिस्तान का औचित्य सिद्ध करने लगे हैं। वे इस सीमा तक जा चुके हैं कि पाकिस्तान की सहानुभूति एवं सहायता भी चाहने लगे हैं और विभाजन के दिनों में पाकिस्तानियंो द्वारा हुए बर्बर अत्याचारों तथा अपमानों को विस्मृत कर बैठे हैं।

इससे दुर्भाग्य की बात भला और क्या होगी कि वर्तमान  सिख-नेता अपने पवित्र पंथ को देश और धर्म के कट्टर विनाशकों के समकक्ष ला खड़ा करने में कमर कसते हैं! इतना ही नहीं तो उन्हीं शत्रुओ से मदद पाने के इच्छुक हैं, जिनके आक्रमणों से मुकाबला कर हमारी रक्षा करने के लिए उसका जन्म हुआ था।

सिखों के नामधारी पंथ के प्रधान ने कहा था-जो व्यक्ति निष्ठावान हिन्दू नहीं है, सिख भी नहीं हो सकता। वह उन महान पुरुषों का शिष्य नहीं हो सकता, जिन्होंने इस मातृ समाज एवं मातृ-धर्म, अर्थात् हिन्दू के लिए अपना रक्त बहाया था। श्री गुरु गोविंदसिंह ने कहा था-सच्चा सिख वही है, जो वेदों और भगवद्गीता में विश्वास रखता है तथा राम और कृष्ण को पूजता है।गुरु के इन शब्दों के प्रति विशुद्ध निष्ठावान ही सच्चा सिख है। इन गुरुओ ने हिन्दू-समाज की रक्षा के लिए वीरों का यह दल गठित किया और उन्हें सिखकी संज्ञा दी, क्योंकि व निष्ठावान शिष्य थे, शीलवान एवं पराक्रमी थे। इसीलिए उन्हें खाससाकहा अथवा अकाल-काल से परे जो सत्य है, उसका पुजारी होने के नाते उन्हें अकालीकहा।    

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