गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

विश्व के हिन्दुओं का संगठन




भरतभूमि दायित्व सदासे,
करना जग का मार्ग प्रदर्शन।
संभ्रम छोड़ उठे हम अर्जुन,
योगेश्वर के अनुयायी हम॥

अपने देश के हिन्दू समाज के साथ मेरा जो भी संबंध आता है, वह अपने संघ की दृष्टि से आता है। संघ राष्ट्रीय है, वह भारत का है और यह है विश्व हिन्दू परिषद। मेरा कार्यक्षेत्र बहुत छोटा है और आप लोगों का बहुत विस्तृत। बड़े क्षेत्र में कार्य करने वालों के सामने मेरा बोलना कुछ धृष्ठता होगी। परन्तु कोई बड़ा काम भी हो तो वह अनेक छोटे-छोटे कामों के एकत्र होने से ही होता है। महासागर भी अनेक बिन्दुओं से मिलकर ही होता है। कितनी भी बड़ी बात हो, उसके अविभाज्य छोटे-छोटे अंश होते ही है।

हिन्दू समाज की संगठित शक्ति के पुनर्जागरण का अर्थात् संघकार्य करने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ है। वह सौभाग्य इस दृष्टि से भी सराहनीय है कि समग्र विश्व के कार्य में भी मेरा योगदान है। दूसरी दृष्टि से विचार करें तो अपना हिन्दू-समाज, उसका धर्म, उसकी संस्कृति तथा परंपरा सबकी जड़ भारत ही है। इस मूल को कार्यप्रवण रखा तो उसकी शाखा-उपशाखाओं के रूप में जगत् भर फैला हुआ हिन्दू-समाज अपना जीवन सुविधा से चला सकेगा। अपने अंदर अपने जीवन-सिद्धांतों को उतार सकेगा। यदि हम लोगों ने देश में अपने स्वत: के जीवन को विस्मृत कर इस मूल को खोखला और अकार्यक्षम कर दिया, तो जगत् भर के अपने हिन्दू लोगों को एकत्र करने के उद्घोष का कोई लाभ नहीं होगा।

अपना देश बड़ा है। इसमें प्रांतवाद है। भाषाओं के कारण एक-दूसरे के साथ स्पर्धा, ईष्र्या इत्यादि चल रही है। जाति की दृष्टि से भी वह जगह संघर्ष चल रहे हैं। कोई अपने को उच्च जाति का मानता है तो कोई दूसरे को नीच जाति की दृष्टि से देखता है। दिन-प्रतिदिन भेद बढ़ते जा रहे हैं। सब प्रकार की सांप्रदायकिता का विरोध करने की घोषणा करने वाले राजनीति-धुरंधर नेता अपने स्वार्ध के लिए इन छोटे-छोटे भेदों को समाज में बढ़ा् रहे हैं। इसका परिणाम जगत् के भिन्न-भिन्न भागों में रहने वाले अपने हिन्दू समाज पर भी हुआ है। मेरे पास अनेक स्थानों से पत्र आते रहते हैं। वहां जाकर आए कुछ मित्र भी मिलते हैं। उनसे समाचार मिलता रहता है। स्पष्ट है कि अपने देश में जिस प्रकार का जीवन हम लोग चलाएंगे, उसका प्रभाव जगत में रहने वाले अपने हिन्दू बंधुओं पर पड़ेगा।

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