शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

धर्म परिवर्तन को लेकर दोहरा मापदंड



                             श्रीनगर। हिन्दू यदि धर्म परिवर्तन का विरोध करते है तब अन्य धर्म के लोग गलत कहते है लेकिन उनके धर्म में यदि ऐसा हो तो विरोध। यह धर्म परिवर्तन का दोहरा मापदंड है। एक ऐसा ही उदाहरण जम्मू कश्मीर में अचानक धर्म परिवर्तन का है। प्रदेश के मुफ्ती आजम मुफ्ती बशीरुद्दीन ने क्रिश्चन प्रीस्ट सी एम खन्ना को तलब किया है। उनसे कहा गया है कि खुद न्यायालय में अपना पक्ष सामने रखें। हालांकि प्रीस्ट खन्ना कहते है उन्हें फंसाने की कोशिश हो रही है।
                          मुफ्ती आजम ने कहा, हमारी शरीअत कोर्ट ने क्रिश्चन प्रीस्ट खन्ना को हाजिर होने को कहा था, वह हाजिर नहीं हुए। अब उन्हें नया समन देकर हाजिर होने के लिए कहा गया है। गौरतलब है कि जम्मू कश्मीर में १९६० की शुरुआत से ही शरीअत कोर्ट है। मुफ्ती बशीरुद्दीन इसके जज हैं और उनके खिलाफ अपील सुनने का अधिकार सिविल कोर्ट को है। मुफ्ती बशीर के मुताबिक चूंकि जम्मू कश्मीर मुस्लिम बहुल राज्य है इसलिए यहां कोर्ट को राज्य सरकार की मान्यता प्राप्त है। मुफ्ती बशीर कहते हैं,‘मुझे शिकायतें मिली हैं कि प्रीस्ट खन्ना मुस्लिम युवक-युवतियों को ईसाई धर्म में दीक्षित कराने की मुहिम में शामिल हैं। इस्लामिक कानून के मुताबिक यह गलत है। दूसरी ओर प्रीस्ट खन्ना ने फोन पर बताया ये आरोप गलत हैं। उनके मुताबिक मुफ्ती बशीरुद्दीन ने करीब 15 दिन पहले उनसे कुछ लड़कों का एक क्रिश्चन स्कूल में एडमिशन कराने में मदद करने को कहा था। मगर, मैंने मुफ्ती बशीर से कहा कि स्कूल मेरे नियंत्रण में नहीं है और अगर वह किसी का ऐडमिशन कराना चाहते हैं तो उन्हें वहां के प्रिंसिपल से बात करनी चाहिए। बकौल प्रीस्ट खन्ना, इसी बात पर मुफ्ती आजम उखड़ गए और उनके खिलाफ धर्मांधरण का मामला बनाते हुए उन्हें समन भेज दिया। 

आचार्य द्विवेदी की दृष्टि में श्रीराम जन्मभूमि


प्रासाद जासु नभमंडल में समाने,
प्राचीर जास् लखि लोकपह सकाने।

अत्यन्त दिव्य, दृढ़, दुर्ग विलोकि वाको,
आश्चर्ययुक्त मन मुग्ध बयो न काको?

जाकी समस्त सुनि सम्पत्ति की कहानी,
नीचो नवाय सिर देवपुरी लजानी।

ताकी अरे निपट निष्ठुर काल ऐसी,
तूने करी शठ दशा अति ही अनैसी।

प्राचीर नाहिं, नहिं दुर्ग, न शीर्षमाला,
अट्टालिकाहु नहिं हेरि परैं विशाला।

उध्वस्त जर्जरित, भग्न शरीर मेरो,
हा! हा! न जाय अब मोसन और हेरो।

अत्युच्च मन्दिर महाई जहां रहे हैं,
देखो, तहां, कबर, आज चहूं छये हैं।

अल्लाह और बिसमिल्लाह आदि बैन,
कीन्हों तहां वधिर मोहिं सुनो परैन।

बिच्छू विषाक्त अहि, मोहि सदा सतावैं।
उन्मत्त मर्कट निरन्तर ही ढहावै।

द्वै चरि चिन्ह मम जो अजहूं दिखाही,
है हैं विलीन सोउ सत्वर भूमि माही।

जाही स्थल प्रचुर हीरन सों संवारो,
सिंहासन-प्रवर राम! रहो तिहारो।

पर्णालयस्थ, तहं मस्जिदमध्य, देखी,
त्वन्मूर्ति दु:खदव मोहिन दहै विशेषी॥

राष्ट्रपति ने माना था अयोध्या ही राम की जन्मस्थली


                                      तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा ने ७ जनवरी, १९९३ को संविधान के अनुच्छेद १४३ के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट को विचार करने और राय देने के लिए संदर्भ किया था, ‘कि ढांचे के मौजूदा स्थान पर रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद (ढांचे के अंदरूनी और बाहरी भवनों सहित) में निर्माण से पूर्व कोई हिंदू मंदिर अथवा कोई हिंदू धार्मिक ढांचा मौजूद था?’ सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय को अपने क्षेत्र से बाहर बताते हुए राष्ट्रपति को संदर्भ वापस लौटा दिया था।
                                                     ..अब उसी विषय पर हाईकोर्ट की तीन सदस्यीय बैंच ने एकमत से फैसला किया  है, ‘हां, वहां हिंदू धार्मिक ढांचा मौजूद था। ..और, यही वह स्थल है जिसे हिंदू रामजन्मस्थान मानते हैं।हाईकोर्ट का स्पष्ट मानना है, ‘धार्मि· ढांचे के ऊपर निर्माण किया गया, जिसे इस्लामिक मान्यता के अनुरूप मस्जिद नहीं माना जा सकता..इस निर्माण में हिंदू धार्मिक ढांचे के अवशेष काम में लिए गए।
                                        उच्चन्यायलय का यह फैसला पुरातात्विक  उत्खनन और समकालीन यात्रा वृत्तांतों-ऐतिहासिक  विवरणों पर आधारित है..जो वैज्ञानिक दृष्टि से साक्ष्य के रूप में मान्यता प्राप्त हैं। यह स्पष्ट नहीं हो सका कि मंदिर तोड़कर उसे मस्जिद का रूप दिया गया या मंदिर के भग्नावशेषों पर मस्जिद का आकार बनाया गया। उच्चन्यायलय इसकी गहराई में जा सकता था और जाने पर और अधिक तथ्य सामने आ सकते थे लेकिन उसके बिना भी सच सामने आ गया। वैसे, इस बात के ऐतिहासिक प्रमाण भी मौजूद हैं कि रामजन्मभूमि पर कथित बाबरी मस्जिद बनाने का काम बाबर से लेकर औरंगजेब के समय तक हुआ..और, मस्जिद का आकार देने का काम औरंगजेब ने करवाया..जिसने धर्मांध होकर काशी विश्वनाथ मंदिर और मथुरा में कृष्ण जन्मस्थान पर बने मंदिरों को तुड़वाने का घृणित कृत्य किया। इलाहाबाद उच्चन्यायलय की लखनऊ खंडपीठ के एक न्यायाधीश एस.यू. खान का कथन ऐतिहासिक तथ्यों से मेल खाता है कि हिंदू धार्मिक स्थल के भग्नावशेषों पर इस्लामिक नियमों के विपरीत बनी बाबरी मस्जिद का निर्माण हुआ। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार बाबर के समय रामजन्मस्थान का स्वरूप बदला गया और औरंगजेब के समय कथित बाबरी मस्जिद बनी। और, जिस समय कथित बाबरी मस्जिद बनी..उस समय के ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार वहां रामजन्मस्थान मंदिर के भग्नावशेष ही थे।
                                   खंडपीठ के एक अन्य न्यायाधीश धरमवीर शर्मा का इस संदर्भ में फैसला महत्वपूर्ण है कि वह संपूर्ण स्थान पूजित है और रामजन्मभूमि के रूप में अनंतकाल से मान्यता प्राप्त है। और, यहीं जाकर न्यायाधीशों में मतभेद है। न्यायाधीश खान और सुधीर अग्रवाल वहां मस्जिद के अस्तित्व को भी मानते हुए उस भूमि के बंटवारे का फैसला सुनाते हैं; जबकि शर्मा इससे असहमत हैं। यक्ष प्रश्न यह खड़ा होता है कि क्या यह किसी के मकान में कब्जा करने वाले को हिस्सा देने जैसा विषय नहीं है..या बड़े रूप में सोचें तो क्या यह भारत विभाजन जैसे तुष्टि·रण का ही लघु रूप नहीं है..यदि ऐसा है तो इस विषय पर भारत की सर्वोच्च सत्ता संसद या सुप्रीम कोर्ट के विचार करने की जरूरत है। यह तुष्टिकरण रामजन्मभूमि के मुद्दे को राजनीतिक बनाने वाले वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के शब्दों वाली राष्ट्रीय एकता के नए अध्याय की शुरुआतनहीं बल्कि भारतीय विरासत के साझेदार हिंदू-मुसलमानों में सकारात्मक और स्पष्ट सोच पैदा होने में बाधा डालने के समान है। भविष्य में ऐसी सोच कश्मीर के बारे में भी कुछ इसी तरह का फैसला करवा सकती है।
                                   यह मुस्लिम भाइयों के लिए विशेष रूप से सोचने का समय है। वहां रामजन्मभूमि सिद्द होना उनकी हार नहीं है; बल्कि उस हककत का सामना है जिसके कारण मुगल शासन में कितने ही हिंदू धर्म परिवर्तन को मजबूर कर दिए गए और आस्था केंद्रों को नष्ट करके उसे अन्य रूप देने की कुत्सित कोशिशें हुईं। रामजन्मभूमि आंदोलन के दौरान अनेक मुस्लिम नेता कहते थे कि यदि यह सामने आ गया कि वहां मंदिर था तो वे खुद वह स्थल हिंदुओं को सौंप देंगे..अब सच सामने आ गया है और यह मुस्लिम समाज के लिए नई शुरुआत करने का समय है..नया अध्याय लिखने का समय है।
                                   संपूर्ण राम जन्मस्थल पूजित है; और, दूसरे के उपासना स्थल पर मस्जिद तामीर करवाना इस्लाम के खिलाफ है। ..वोटों की राजनीति के चलते वहां एक ओर मस्जिद बन तो सकती है लेकिन वह किसी भी रूप में मुसलमान भाइयों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण नहीं हो सकती। और, यह बनेगी भी तो किस शर्त पर..इक बाल के शब्दों वाले इमाम-ए-हिंद..भारत के आराध्य..भारतीय संविधान में आदर्श के रूप में चित्रित और करोड़ों हिंदुओं के भगवान राम के सबसे महत्वपूर्ण जन्मस्थल का एक हिस्सा लेकर..मुसलमान भाइयों के लिए भी यह उचित नहीं होगा। उन्हें वहां कब्जे के बदले मिलने वाला एक तिहाई हिस्सा भी हिंदुओं को सौंप देना चाहिए। इस महान कार्य से एक नए अध्याय की शुरुआत होगी। ऐसे भारत का निर्माण होगा, जिसमें सहअस्तित्व और सौहार्द की बुनियाद होगी और देश को परम वैभव पर पहुंचाने का सपना होगा। बाबर-औरंगजेब के  आपराधिकपूर्ण कृत्य का यही परिमार्जन होगा। 
                                                                     लेखक - गोपाल शर्मा 

छत्तीसगढ़ का त्यौहार जेठौनी


देव प्रबोधनी एकादशी पर मंदिरों व घरों में भगवान लक्ष्मीनारायण की पूजा-अर्चना की जाएगी। शालिगराम एवं तुलसी विवाह भी होंगे। दीपावली के ११ दिन बाद देव प्रबोध उत्सव और तुलसी विवाह को देवउठनी ग्यारस कहते हैं। एकादशी को यह पर्व बड़े उत्साह से मनाया जाता है। क्षीरसागर में शयन कर रहे श्री हरि विष्णु को जगाकर उनसे मांगलिक कार्यों की शुरुआत कराने की प्रार्थना की। मंदिरों व हिन्दुओं के घरों में गन्नों के मंडप बनाकर श्रद्धालु भगवान लक्ष्मीनारायण का पूजन कर उन्हें बेर, चने की भाजी, आंवला सहित अन्य मौसमी फल व सब्जियों के साथ पकवान का भोग अर्पित करेंगे। मंडप में शालिगराम की प्रतिमा व तुलसी का पौधा रखकर उनका विवाह कराया जाएगा। इसके बाद मंडप की परिक्रमा करते हुए भगवान से कुंवारों के विवाह कराने और विवाहितों के गौना कराने की प्रार्थना की जाती है। दीप मालिकाओं से घरों को रोशन किया जाएगा  और बच्चे पटाखे चलाकर खुशियां मनाते है। वास्तव में यह पर्व तुलसी का हमारे दैनिक जीवन में महत्व बताने का भी माध्यम है। तुलसी एक ऐसा पौधा जो हमें शुद्ध वायु देता है।

कैसे करें ग्यारस के दिन पूजन :-

देवउठनी ग्यारस के दिन ब्रम्ह मुहूर्त में जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए। इस दिन घर के दरवाजे को पानी से स्वच्छ करना चाहिए, फिर चूने व गेरू से देवा बनाने चाहिए। उसके ऊपर गन्ने का मंडप सजाने के बाद देवताओं की स्थापना करना

बुधवार, 26 अक्टूबर 2011

जनजातियों की जमीन वापस दिलाने का निर्णय बरकरार



जशपुरनगर। छग भू राजस्व संहिता की बहुचर्चित धारा १७० ख को लेकर अनुविभागीय अधिकारी द्वारा पूर्व में जनजातियों को उनकी जमीन वापस दिलाये जाने के निर्णय पर अपील खारिज करते हुए जिलाधीश ने जनजातियों को जमीन वापस दिए जाने के निर्णय को बरकरार रखा है। ग्राम घोलेंग के एक मामले में २० साल से एक प्रकरण लंबित था। इस प्रकरण में आवेदिका सेवती बाई ने भू राजस्व संहिता की धारा १७० ख के तहत अनुविभागीय अधिकारी के न्यायालय में गुहार लगाते हुए अपनी जमीन वापस दिलाए जाने की मांग की थी। अनुविभागीय अधिकारी ने उक्त मामले में मिशन संस्था से जुड़े अनावेदक कैथोलिक आश्रम और सिस्टर एसोसिएशन के जमीन पर काबिज होने को अवैध बताते हुए आवेदिका के पक्ष में निर्णय दिया था, जिसके विरोध में  जिलाधीश के न्यायालय में अपील की गई थी। जिलाधीश ने अनुविभागीय अधिकारी के न्यायालय में हुए निर्णय को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी। जिला प्रशासन ने जब ऐसे सभी लंबित मामलों के निराकरण प्रारंभ किया, तो पूरे जिले में बवाल उत्पन हो गया। कई समूहों ने इसे राजनैतिक रूप देने का प्रयास किया। मामला पूरे देश में तब चर्चित हुआ जब पत्थलगांव बंधियाखार के एक प्रकरण में निर्णय सुनाते हुए २ फरवरी २००३ को मिशन संस्था की बांउड्री वाल तोडक़र मूल भूमि स्वामी को कब्जा दिलाया गया। इसके बाद जब जनजातियों को कब्जा दिलाने के लिए जिला प्रशासन की टीम ग्राम बड़ा करौंजा में २८ दिसंबर २००३ को पहुंची तो टीम को ही आठ घंटे तक बंधक बना लिया गया। इसी प्रकार ग्राम जुड़वानी में तहसलीदार को, जरिया में आरआई व पटवारी को बंधक बनाया गया। मामले को लेकर अल्प संख्यक आयोग के तात्कालीन अध्यक्ष हामिद अंसारी ने जिलाधीश को कार्रवाई रोकने और अल्प संख्यकों को प्रताडि़त करने का आरोप लगाते हुए जिलाधीश को पत्र भी लिखा था। जिसे जिलाधीश ने न्यायालयीन कार्रवाई में हस्तक्षेप मानते हुए न्यायालय की अवमानना का नोटिस आयोग के अध्यक्ष हामिद अंसारी को भेजा था। इसके बाद आयोग की दो सदस्यीय दल ने जिले की स्थिति का निरीक्षण किया और जन सुनवाई की, जिसमें आयोग के सदस्यों ने न्यायालयीन कार्रवाई को सही मानते हुए शिकायतों को निरस्त कर दिया।

धर्म परिवर्तन का विरोध करने पर हत्या करने वाले को सजा...



संस्कृति के रक्षक को मिला न्याय

यह घटना हिन्दू संस्कृति के रक्षक रकबन केरकेट्टा की दु:ख भरी अंत की है जिसमें न्यायालय ने दोषियों को सजा सुनाई है। लेकिन इसके बावजूद कानून की कुछ कमजोर कडिय़ों का सहारा लेकर इस क्षेत्र में दहशत का वातावरण निर्मित करने वाले लोग आज भी खुले आम घूम रहे है। छत्तीसगढ़ एक वनवासी बाहुल्य क्षेत्र है, आजादी से लेकर आज तक शासन और समाज ने इनके विकास में अपना महत्वपूर्ण  योगदान दिया है इसके बावजूद अब भी सुदूर वनवासी क्षेत्र में एकात्मता के भाव का जागरण छूट सा गया है। इसी कमी का लाभ उठाकर इन क्षेत्रों में धर्मान्तरण का हिंसक व घिनौना खेल यदाकदा उदाहरण के रुप में हमारे सामने प्रमाणित है। ऐसी ही घटना के साक्षी रकबन केरकेट्टा, (बेलगहना) निवासी थे जिन्होंने कई वर्षों तक चर्च व पादरियों से अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए संघर्ष किया। जनवरी २०१० में तो धर्मान्तरण के लिए लाये गये कपड़े, खाद्यान्न व अन्य  सामग्री से भरी ट्रक को भी इन्होंने पकड़वाया था।  ऐसी ही कई छूटपूट संघर्ष के कारण ही दो बार हिन्दू संस्कृति के विरोधी बिलासपुर में मानसिक प्रताडऩा के लिए लेकर आये। इन सबकों देखकर रकबन केरकेट्टा ने बेलगहना थाने में इनके खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज करायी।  लेकिन २०१० में चर्च ने षडय़ंत्र करके उनके ही रिश्तेदार बलदेव उरांव के द्वारा हत्या रकबन केरकेट्टा  हत्या करा दी गई और आज भी उनके परिवार को समय-समय पर धमकी दी जा रही है। यह घटना चर्च के घिनौने षड्यंत्र का पर्दाफाश करती है। लेकिन न्यायालय के द्वारा इन आरोपियों को सजा मिलने से ऐसी घटनाओं में रोक लगने की उम्मीद है...
बिलासपुर। धर्म परिवर्तन के विरोध में हत्या करने के प्रकरण पर फैसला देते हुए पंचम अपर सत्र न्यायाधीश ने तीन आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है।
धर्मपरिवर्तन कराये जाने को लेकर ग्राम बेलगहना निवासी रकबन केरकेट्टा का गांव के ही सलीम कुजूर पिता जगर साय (२०वर्ष) संतोष सिंह खलखों पिता प्रेम सिंह (२७ वर्ष) व बंगलाभाठा निवासी बलदेव उरांव पिता चाकोराम (४८वर्ष) के साथ धर्मान्तरण को लेकर विवाद चल रहा था, रंजिश की वजह से १४ जून २०१० की दोपहर सलीम संतोष व बलदेव ने रकबम को उसके घर से अपने साथ ले गये एवं लाठी डंडे से मारपीट कर उसकी हत्या कर दी और शव को जंगल में फेंक दिया, अगले दिन सुबह पुलिस ने शव जंगल से बरामद कर मामला पंजीबद्ध किया। उक्त प्रकरण पर पंचम अपर सत्र न्यायाधीश हेमंत सराफ ने फैसला देते हुए तीनों आरोपियों के खिलाफ धारा १४७ के तहत एक-एक वर्ष का कारावास व १०० रु. का अर्थदंड ३२०/१४९ के तहत ३-३ साल की कैद १०० रु. का अर्थदंड धारा १२० बी के तहत आजीवन कारावास व १०० रु. का अर्थदंड देने का फैसला सुनाया है।

प्राचीन परंपरा का जीवंत दर्शन कर्मा उत्सव



यह पर्व मानव को अपनी परंपरा और आदर्शों से जोडक़र रखते है। जशपुरांचल में कर्मा उत्सव से यह बात सच साबित होती है। विश्व कल्याण की भावना से यहां के ग्रामीण पूरी श्रद्धाभाव से अपने आराध्य की उपासना करते है और उल्लास व उमंग की छटा बिखेरते हुए नृत्व वाद्य यंत्रों  के सहारे ईश्वर से एकाकार होने का प्रयत्न करते है...
जशपुरनगर। इन दिनों जिले भर में दशई कर्मा की धूम देखने को मिल रही है। जिला मुख्यालय में बांकी टोली अखरा स्थल पर कई गांवों से विभिन्न टोलियों में जनजाति महिला, पुरूष करमा डाल के साथ झूमते गाते पहुंंचे। यहां भव्य कर्मा उत्सव का आयोजन किया गया।
विश्व कल्याण की कामना लिए कुंवारी कन्याओं के इस अनूठे अनुष्ठान में पूर्व अजाक मंत्री के साथ सीआरपीएफ के कमांडेंट दलजीत सिंह भी पहुंचे। जगह-जगह पर आयोजित करमा उत्सव से ग्रामीण काफी उत्साहित नजर आ रहे हैं। जिले भर में कर्मा उत्सव का यह पारंपरिक नजारा दीपावली तक देखने को मिलेगा। अपनी प्राचीन परंपराओं को जीवंत रखने में जहां समाज के बड़े बुजूर्ग अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं। वहीं कुंवारी कन्याएं भी अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रहे हैं। कर्मा उत्सव जनजाति समाज की पूर्वजों से चली आ रही परंपरा है, जिसमें कुंवारी कन्याएं २४ घंटे का निर्जला व्रत रखकर विश्व कल्याण और स्वस्थ्य समाज की कामना करती हैं। इस दिन कुंवारी कन्याओं को समाज के लोग मां पार्वती की संज्ञा देते हुए उनके अनुष्ठान में हर संभव मदद करते हैं। पिछले दिनों जनजाति समाज के इस अनूठे पंरपरा को जीवंत नगर के प्रमुख सडक़ों पर देखा गया, जब पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ लोक गीत गाते हुए ग्रामीण करमा डाली लेकर इस अनुष्ठान को पूरा करने निकले। बांकी टोली में ग्रामीणों की शोभा यात्रा निकली। जहां पूरी रात लोक कला की कई छटाएं बिखरती रही। जिले के विभिन्न गांवो से ग्रामीण सामुहिक कर्मा उत्सव मनाने के लिए यहां के मधुवन टोली में एकत्रित हुए। यहां विधिवत पूजा अर्चना करने के बाद कुंवारी कन्याओं ने कर्मा डाली को अपने कांधे में लेकर शोभा यात्रा निकाली। नगर के मुख्य मार्गों से झूमते गाते शोभा यात्रा अखरा स्थल पहुंची जहां करमा राजा को डाली के रूप में स्थापित किया गया। यहां सरहुल ध्वज के पास करमा डाली की स्थापना बैगाओं द्वारा की गई। पूजा अर्चना के बाद कर्मा कथा बैगाओं द्वारा सुनाया गया।
कन्याओं के साथ सभी ग्रामीणों ने विश्व कल्याण के लिए महादेव, पार्वती से प्रार्थना की। पूजा के बाद पूरी रात जनजाति समाज पारंपरिक गीतों और वाद्य यंत्रों के माध्यम से अपने आराध्य देव महादेव पार्वती को मनाते रहे और विश्व कल्याण तथा स्वस्थ्य समाज की कामना करते रहे। सुबह पारन करते हुए कर्मा डाली का नदी में कन्याओं ने विसर्जन किया। इसके बाद कन्याओं ने व्रत तोड़ा। इस उत्सव में सरीक होकर सीआरपीएफ के जवान भी अभिभूत हुए। नगरीय समुदाय की काफी भागीदारी इस उत्सव में देखने को मिली। पूर्व अजाक मंत्री ने बताया कि दशहरा के बाद दशई कर्मा मनाया जाता है।
अपनी सुविधाओं के अनुशार अलग-अलग गांवों में जनजाति समाज के लोग कर्मा उत्सव का आयोजन करते हैं, जो दीपावली तक चलता है। इस अवसर पर कमांडेंट दलजीत सिंह, सुदीप मुखर्जी, कल्याण आश्रम के डॉ मृगेंद्र सिंह, रामप्रकाश पांडे, सत्य प्रकाश तिवारी, उरांव समाज के अध्यक्ष राम दयाल मांझी, बैगा राधेश्वर प्रधान, बलराम सहित बड़ी संख्या में जिले के विभिन्न गांवों से आए ग्रामीण महिला, पुरूष और जनप्रतिनिधि उपस्थित थे।